भोपाल। मध्य प्रदेश कांग्रेस में एक बार फिर अंदरूनी राजनीति चर्चा का विषय बन गई है। दतिया उपचुनाव की तैयारियों के बीच पार्टी से एकजुटता का संदेश जाने की उम्मीद थी, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने संगठन के भीतर अलग-अलग शक्ति केंद्रों की मौजूदगी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह (Digvijaya Singh) और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार (Digvijaya Singh) की बंद कमरे में हुई लंबी मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में नए समीकरणों को लेकर चर्चाओं को और तेज कर दिया है।
सूत्रों के अनुसार, उमंग सिंघार ने हाल ही में दिग्विजय सिंह से उनके भोपाल स्थित निवास पर मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच करीब दो घंटे तक बातचीत हुई। आधिकारिक तौर पर इस मुलाकात को लेकर कोई विस्तृत जानकारी सामने नहीं आई, लेकिन इसके समय और राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए इसे सामान्य शिष्टाचार भेंट से आगे की घटना माना जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि दोनों नेताओं के रिश्ते हमेशा सहज नहीं रहे हैं। वर्ष 2018 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद उमंग सिंघार ने सार्वजनिक रूप से दिग्विजय सिंह पर सरकार के कामकाज में हस्तक्षेप के आरोप लगाए थे। ऐसे में वर्षों बाद दोनों नेताओं की निकटता ने नई राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दिया है।
हाल के दिनों में उज्जैन स्थित वीर भारत न्यास को भूमि आवंटन के मुद्दे पर कांग्रेस के भीतर अलग-अलग राय सामने आईं।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी जमीन बेहद कम कीमत पर एक ट्रस्ट को उपलब्ध कराई। इसके बाद दिग्विजय सिंह ने सार्वजनिक रूप से कहा कि संबंधित भूमि सरकारी ट्रस्ट की व्यवस्था से जुड़ी है और उसे निजी संस्था को नहीं दिया गया।
इन अलग-अलग बयानों को भाजपा ने कांग्रेस की अंदरूनी असहमति का मुद्दा बनाया। बाद में दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस पूरी तरह एकजुट है और उनके तथा जीतू पटवारी के बीच किसी प्रकार का मतभेद नहीं है।
प्रदेश कांग्रेस में संगठन की कमान नई पीढ़ी के नेताओं—जीतू पटवारी और उमंग सिंघार—के हाथ में है। दोनों को राहुल गांधी की नई टीम का अहम चेहरा माना जाता है।
दूसरी ओर दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेता अभी भी प्रदेश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की सक्रियता पहले की तुलना में सीमित मानी जा रही है। ऐसे में संगठन के भीतर नई और अनुभवी नेतृत्व टीम के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखना कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है।
मध्य प्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी का मुद्दा नया नहीं है। समय-समय पर नेताओं के अलग-अलग बयान और राजनीतिक गतिविधियां इस चर्चा को हवा देती रही हैं। दतिया उपचुनाव से पहले भी पार्टी के भीतर समन्वय और रणनीति को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस अपने सभी वरिष्ठ और युवा नेताओं को एक मंच पर प्रभावी ढंग से साथ लेकर चलती है, तो भाजपा के सामने मजबूत चुनौती पेश कर सकती है। लेकिन अलग-अलग शक्ति केंद्रों की धारणा संगठनात्मक मजबूती पर असर डाल सकती है।
वरिष्ठ पत्रकार गणेश साकल्ले का कहना है कि कांग्रेस के नेता सार्वजनिक रूप से एकजुटता की बात करते हैं, लेकिन कई बार अंदरूनी मतभेद भी सामने आ जाते हैं। उनके अनुसार, केवल बैठकों और मुलाकातों से नहीं बल्कि चुनावी रणनीति और संगठनात्मक कामकाज में समन्वय दिखने पर ही वास्तविक एकजुटता का संदेश जाएगा।
वहीं वरिष्ठ पत्रकार अरविंद तिवारी का मानना है कि प्रदेश नेतृत्व को वरिष्ठ नेताओं के अनुभव का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग करना चाहिए। उनके अनुसार, बड़े राजनीतिक मुद्दों पर साझा रणनीति और समन्वित बयानबाजी पार्टी की विश्वसनीयता को मजबूत कर सकती है।
हालांकि, कांग्रेस की ओर से पार्टी में किसी भी तरह के गुटीय मतभेद से इनकार किया जाता रहा है और नेतृत्व लगातार संगठन की एकजुटता पर जोर देता आया है।
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